टिहरी की छुंईं बथ ने छेड़ दिए भावनाओं के तार, लेक फेस्टिवल में पहली बार टिहरी के अतीत पर भावनात्मक विमर्श

टिहरी : टिहरी की छुंईं बथ यानी ऐतिहासिक नगरी टिहरी की वो बातचीत, जो अपने में समेटे है भावनाओं का समुंदर। जिसकी एक-एक लहर तूफान उठाती है। टिहरी लेक फेस्टिवल में पहली बार पुरानी यादों पर चर्चा करने का माहौल बना, तो बहुत सारी सुनी-अनसुनी बातों ने स्मृतियों को ताजा कर दिया। इस खास आयोजन में टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय और टिहरी डीएम नितिका खंडेलवाल सहभागी रहे।

टिहरी तक सड़क नहीं थी, पर दौड़ती थी कार

वरिष्ठ पत्रकार व इतिहासकार महीपाल नेगी ने बताया कि उस जमाने में टिहरी तक सड़क नहीं थी, लेकिन महाराजा कीर्ति शाह एक बार दूसरे शहर में जाकर कार देख आए। उन्हें उसी कार को चलाने की इच्छा हुई। इसके बाद, वह कार के अलग-अलग पार्ट टिहरी लाए गए और उन्हें वहीं असंबेल किया गया। इस तरह, टिहरी में महाराजा की कार दौड़ी। हिमांशु असवाल ने भी इससे संबंधित बात शेयर की।

बहुगुणा जी ने कहा-सुमन जी की ओर दृष्टि करो

टिहरी बांध निर्माण के विरोध में आंदोलन कमजोर पड़ रहा था। गुरूद्वारे तक पानी पहुंच चुका था। लोगों को लगता था कि अब टिहरी डूब के ही रहेगा। इसलिए लोगों का मनोबल टूट गया था। ऐसे में स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा की एक बात ने आंदोलनकारियों में जोश भर दिया। शैलेंद्र नौटियाल ने बताया-बहुगुणा जी ने तब लोगों से कहा था कि श्रीदेव सुमन जी की तरफ अपनी दृष्टि डालो, जिन्होंने संघर्ष को नई परिभाषा दी।

राजा के अहम पर चोट लगी, प्रतापनगर बस गया

तब मसूरी अंग्रेजों के नियंत्रण में था। महाराजा प्रताप शाह के मसूरी में प्रवेश को अंग्रेजों ने एक विवाद के प्रतिबंधित कर दिया। महाराजा के अहम को चोट लगी, तो उन्होंने प्रतापनगर बसा दिया। सभासद प्रीति पोखरियाल ने इस पुरानी बात को याद किया।

नई टिहरी कुछ इस तरह उभरकर सामने आ गई

दिनेश डोभाल ने छुंईं बथ करते हुए बताया कि किस तरह से नई टिहरी का उदय हुआ। उन्होंने बताया कि 25 जुलाई 1989 की वो तारीख थी, जब नई टिहरी को एक नगर के रूप में मान्यता दे दी गई। लक्ष्मी नौडियाल सेमवाल ने वनों की नीलामी के विरोध में चले आंदोलन का जिक्र किया।

टिहरी की रामलीला की याद, अब दूून में विस्तार

टिहरी में रामलीला की शुरूआत वर्ष 1952 में हुई। अमित पंत और उनके परिजन हमेशा इसमें सक्रिय योगदान देते रहे। टिहरी पानी में समाया, लेकिन रामलीला की यादें जिंदा रहीं। सामाजिक कार्यकर्ता अभिनव थापर अपने प्रयासों से अब इस रामलीला का मंचन हर वर्ष देहरादून में कर रहे हैं। अभिनव थापर ने रामलीला को लेकर बात की।

पहल को आगे ले जाने का झील किनारे संकल्प

छुंईं बथ जैसे कार्यक्रम को भविष्य में होने वाले लेक फेस्टिवल में और व्यापक स्तर पर करने का टिहरी झील किनारे संकल्प लिया गया। इस कार्यक्रम के आयोजन में खास भूमिका निभाने वाले महीपाल नेगी, अमित पंत, प्रमोद रावत, देवेंद्र नौटियाल ने कहा-शुरूआत अच्छी हुई है। इस पहल को आगे ले जाया जाएगा।

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