उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को 25 मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु करेंगी पद्मभूषण से सम्मानित

  • कोश्यारी प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, पत्रकार और राष्ट्रवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं
  • 1966 में कोश्यारी ने उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़ में ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ की स्थापना की, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा के अवसरों को मजबूत किया गया
  •  वर्ष 2008 में कोश्यारी राज्य सभा के लिए चुने गए और 2014 में वह नैनीताल-ऊधम सिंह नगर निर्वाचन क्षेत्र से लोक सभा के लिए चुने गए
  • 25 मई को नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण से सम्मानित किया जाएगा।

देहरादून/नई दिल्ली : भगत सिंह कोश्यारी, जिन्हें उत्तराखंड राज्य में ‘भगत दा’ के नाम से जाना जाता है, एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, पत्रकार और समर्पित राष्ट्रवादी नेता हैं, जिन्होंने अपना जीवन जन सेवा और समाज के गरीब और पिछडे वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। वह आरएसएस के एक निष्‍ठावान स्वयंसेवक हैं और अपनी सादगी, अनुशासन और सीखने के प्रति गहरे प्रेम के लिए जाने जाते हैं।

17 जून, 1942 को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के पहाड़ी इलाके के सुदूर गांव पलानधुरा में जन्मे कोश्यारी ने अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि के बावजूद दृढ़ संकल्प के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त की और 1964 में आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री पूरी की। उन्होंने 1964-1965 के दौरान राजा का रामपुर (एटा, उत्तर प्रदेश) में व्याख्याता के रूप में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। हालांकि, शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से प्रेरित होकर, उन्होंने 1965 के बाद से स्‍वयं को पूरी तरह से शैक्षणिक और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

कोश्यारी ने सरस्वती शिशु मंदिर, कासगंज (उत्तर प्रदेश) में पढ़ाना शुरू किया, जहां उन्होंने छोटे बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय मूल्य प्रदान करने का काम किया। वर्ष 1966 में, उन्होंने उत्तराखंड के एक सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़ में ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ की स्थापना की, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा के अवसरों को मजबूत किया गया। उन्होंने पिथौरागढ़ में विवेकानंद इंटर कॉलेज की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरस्वती विहार, नैनीताल से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उन्होंने कई वर्षों तक आरएसएस के विभाग कार्यवाह के रूप में कार्य किया और बाद में उत्तरांचल उत्थान परिषद के सचिव बने, जो दशकों तक उत्तराखंड में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए समर्पित संगठन है। वर्ष 1979 से 1990 तक, वह कुमाऊं विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे, जिन्होंने शैक्षिक नीति और संस्थागत विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने जागरूकता और सामाजिक चेतना को बढ़ावा देने के लिए पिथौरागढ़ से हिंदी साप्ताहिक “पर्वत पीयूष” के प्रकाशन की भी शुरुआत की। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, उन्हें आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया था, जो सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है।

वर्ष 1997 में कोश्यारी को उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए नामित किया गया था। नवंबर 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद, वह राज्य के पहले मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने और बाद में थोड़े समय के लिए उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने उत्तराखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी काम किया। वर्ष 2008 में, वह राज्य सभा के लिए चुने गए और 2014 में, वह नैनीताल-ऊधम सिंह नगर निर्वाचन क्षेत्र से लोक सभा के लिए चुने गए। उत्तराखंड में ऊर्जा मंत्री के रूप में, उन्होंने लंबे समय से लंबित टिहरी हाइड्रो परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें टिहरी के ऐतिहासिक शहर और जिला मुख्यालय का स्थानांतरण शामिल था। उन्होंने राज्य सभा और लोक सभा दोनों में याचिका समिति के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया, जहां उन्होंने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन सहित वन रैंक वन पेंशन, रेल कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों पर विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत कीं। बाद में उन्हें 5 सितंबर, 2019 को महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने प्रभावी ढंग से सेवा की और राज्य के लगभग सभी जिलों के साथ-साथ कई ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण किलों का दौरा किया। इसके अलावा, अगस्त 2020 में, उन्हें गोवा के राज्यपाल (अतिरिक्त प्रभार) के रूप में भी नियुक्त किया गया था।

शिक्षा और राजनीति में उनके योगदान के अलावा, कोश्यारी एक लेखक भी हैं। उन्होंने “उत्तरांचल प्रदेश क्यों” और “उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान” नामक दो पुस्तकें लिखी और प्रकाशित की, जो उत्तराखंड के विकास के प्रति उनकी संकल्‍पना और प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। उनका जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पण, नेतृत्व और अटूट सेवा का एक प्रेरक उदाहरण है।

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